आखिर क्यों डरते हैं इस मंदिर में आने के लिए ब्राह्मण

आखिर क्यों डरते हैं इस मंदिर में आने के लिए ब्राह्मण 

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में एक ऐसा मंदिर है, जहां एक गांव के लोग हर रोज दर्शन करते हैं और दूसरे गांव के लोग वहां जाने से भी डरते हैं। हत्या देवी कोई और नहीं सुकेत राज्य की राजकुमारी हैं। हां आप लोग ठीक समझ रहे हैं सुकेत के राजा वही राजा है जिन की कुलदेवी मां कामाक्षा है जिसके बारे मे मैं आपको पहले बता चुका हूं। एक समय में सुंदर नगर का नाम सुकेत हुआ करता था। 

वही सुंदर नगर जिसको आजकल आप किसको आप मंडी जिले की तहसील के रूप में जानते हो। प्राचीन काल में सुकेत रियासत की राजधानी का नाम बनेड था और उसके बाद उसको
महाराजा लक्ष्मण सेन के द्वारा उसका नया नाम बनेड से बदलकर सुंदर नगर रख दिया था । परंतु सुकेत के राजा की सबसे प्राचीन राजधानी पांगड़ा थी और अंतिम सुंदरनगर थी ।

Mahamaya pangan ka sihsan -
आखिर क्यों डरते हैं इस मंदिर में आने के लिए ब्राह्मण 2

आइए जानें कैसे राजकुमारी हत्या देवी और महामाया देवी बन गई और क्यों एक गांव के
लोग इसके मंदिर में जाने से डरते हैं?

मंडी जिले का फॉर्मल नाम मनदेव नगर है। एक समय में यह जिला सुकेत नाम का राज्य था। इस राज्य के राजा थे महाराज रामसेन। राज्य की राजकुमारी और राजा रामसेन की बेटी चंद्रावती अक्सर महल के प्रांगण में अपनी सखियों के साथ खेला करती थीं। सर्दियों के मौसम में एक बार राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ महल में खेल रहीं थी। उनकी एक सहेली ने पुरुष का वेष बनाया और बाकी सहेलियां अठखेलियां करने लगीं। तभी राज्य के पुरोहित जी वहां से गुजरे। 

इस दौरान उनकी नजर लड़के का वेष धारण की हुई लड़की पर पड़ी और वह उसे वाकई पुरुष समझ बैठे। उन्होंने जाकर राजा से राजकुमारी की शिकायत कर दी। इस पर राजा क्रोधित
हो गए और उन्होंने राजकुमारी को तुरंत अपनी शीतकालीन राजधानी पांगणा भेज दिया। खुद पर लगे आरोप और अपनी बात रखने का अवसर न मिलने के कारण राजकुमारी बहुत दुखी
थीं। उन्होंने विषैले बीज खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। उसी रात वह अपने पिता राजा रामसेन के सपने में आईं और बोलीं ‘मेरे मृत शरीर को महामाया देवी कोट मंदिर पांगणा के परिसर में गाढ़ देना। 

फिर 6 महीने बाद खुदाई करके मेरे शरीर को वापस निकालना, अगर मैं पवित्र हूं तो मेरा शरीर पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और अगर मैं पवित्र नहीं हूं तो मेरा शरीर सड़ जाएगा। यदि शरीर सुरक्षित रहे तो आप इसका विधि-विधान से अंतिम संस्कार चंदपुर में करना।’ सपना पूरा होते ही राजा की घबराहट में आंख खुल गई। उन्होंने तुरंत सैनिकों को भेजकर पुरोहितजी और राज्य के अन्य ज्योतिषियों को बुलाया। 

राजा ने उन्हें अपने सपने के बारे में बताया। इस पर सभी ने राजा को सलाह दी कि वह तुरंत पांगणा के लिए प्रस्थान करें। वहां पहुंचने पर राजा को सूचना मिली की राजकुमारी ने विषैले बीच खाकर आत्महत्या कर ली है। आज आज भी पत्थर शीला शीला महामाया मंदिर में आपको देखने के लिए मिलेगा शिशिला में राजकुमारी ने जहर पिसा हुआ था।

यह खबर सुनकर राजा बहुत दुखी हुए। लेकिन अपनी पुत्री की इच्छानुसार उन्होंने राजकुमारी का शव महामाया मंदिर परिसर में ही दफना दिया। फिर 6 महीने बाद जब राजकुमारी के शव को फिर से निकाला गया तो वह पूरी तरह सुरक्षित था। राजा बहुत दुखी हुए और अपनी भूल पर पश्चताप करने लगे। गलत सूचना देने के कारण उन्होंने पुरोहित को राज्य से बाहर कर ऐसी जगह भेज दिया जहां पानी और खाने की चीजों का अभाव था।

राजकुमारी की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार पांगणा के समीप चंदपुर में कर दिया गया। इस स्थान पर शिव-पार्वती का मंदिर बना दिया गया और शिवलिंग की स्थापना की गई। आज इस मंदिर को दक्षिणेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। लेकिन राजकुमारी पर शक करने के दुख के चलते राजा अपराधबोध से पूरी तरह घिर गए और दुखी रहने लगे। इस कारण कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।

आजकल यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में हत्या देवी के नाम से प्रसिद्ध है। इसलिए मंदिर में जाने से डरते हैं गौतम गोत्र ब्राह्मण के वंशज

क्यों नहीं आते मंदिर में गौतम गोत्र पुरोहित के वंशज?

राजा ने पुरोहित को सजा के तौर पर चुराग नामक जगह पर भेजा था। उस समय इस जगह पर रहने और खाने की उचित व्यवस्था नहीं थी। पुरोहित के वंशज आज भी इस क्षेत्र में रहते हैं। देवी के कोप से डरकर आज तक ये लोग महामाया देवी मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं करते।

इन्हें डर है कि कहीं इनके पूर्वजों की गलती की सजा इन्हें न भुगतनी पड़े। पांगणा स्थित महामाया देवी कोट मंदिर परिसर में जिस स्थान पर राजकुमारी का शव गाड़ा गया था, उस स्थान पर उनकी याद में एक कक्ष का निर्माण कराया गया था और तभी से यहां राजकुमारी की पूजा हत्या देवी के रूप में होती है। 

मंदिर में आनेवाले श्रद्धालु हत्यादेवी की पूजा-अर्चना करते हैं। यह मंदिर साल में कुछ विशेष अवसरों पर ही खोला जाता है। सुकेत राजवंश और गांव के लोगों की हत्यादेवी में विशेष आस्था है ।

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